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अलकायदा के साथ संबंध बरकरार रखेगा तालिबान- संयुक्त राष्ट्र


वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Updated Wed, 03 Jun 2020 11:36 AM IST

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संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि तालिबान की विशेष हक्कानी नेटवर्क शाखा का संबंध अलकायदा के साथ बरकरार रहेगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सौंपी गई एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान नियमित तौर पर अमेरिका के साथ बातचीत के दौरान अलकायदा से बात की है और अलकायदा को इस बात की गारंटी दी है कि वो उनके ऐतिहासिक संबंध का सम्मान करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अलकायदा और तालिबान की दोस्ती का आधार साझा संघर्ष का इतिहास, वैचारिक सहानुभूति है।

29 फरवरी को अमेरिका ने तालिबान के साथ जो शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, उसके मुताबिक तालिबान ने स्पष्ट तौर पर अलकायदा से अमेरिका और उसके सहयोगियों को ना डराने की बात कही है। लेकिन जानकारों का सवाल है कि क्या जमीनी स्तर पर तालिबान का ये वादा पूरा होता नजर आएगा।

अफगान के जानकारों का मानना है कि तालिबान संगठन में अब एकाश्म नहीं रहा है। दशकों से तालिबान में शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो चुका है, जिसके तहत हर कमांडर के पास अपना फैसला लेने की आजादी है। शक्तियों के विकेंद्रीकरण से शांति समझौते के जमीनी स्तर पर परिणाम दे जाना संदेहपूर्ण लगता है।

जितने भी आदिवासी समूह हैं उसमें हक्कानी नेटवर्क सबसे ज्यादा शक्तिशाली और खतरनाक संगठन है। हक्कानी नेटवर्क मुख्त रूप से पाकिस्तान के वजिरिस्तान में स्थित है। हक्कानी परिवार ने जलालउद्दीन हक्कानी की मौत के बाद अलकायदा और पाकिस्तान के आईएसआई संगठन से नाता तोड़ लिया था।

इसके बाद हक्कानी संगठन ने उन्नति करना शुरू कर दिया था और इसके मौजूदा नेता सिराजुद्दीन हक्कानी अफगान तालिबान का सेकंड-इन-कमांड के तौर पर काम करता है। जबकि सिराजुद्दीन हक्कानी का छोटा भाई समझौते वाली टीम में शामिल था। 

सार

  • अलकायदा के साथ संबंध बरकरार रहेगा तालिबान- यूएन
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दी गई रिपोर्ट में किया गया खुलासा
  • अमेरिका का तालिबान के साथ शांति समझौते पर सहमति

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि तालिबान की विशेष हक्कानी नेटवर्क शाखा का संबंध अलकायदा के साथ बरकरार रहेगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सौंपी गई एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान नियमित तौर पर अमेरिका के साथ बातचीत के दौरान अलकायदा से बात की है और अलकायदा को इस बात की गारंटी दी है कि वो उनके ऐतिहासिक संबंध का सम्मान करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अलकायदा और तालिबान की दोस्ती का आधार साझा संघर्ष का इतिहास, वैचारिक सहानुभूति है।

29 फरवरी को अमेरिका ने तालिबान के साथ जो शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, उसके मुताबिक तालिबान ने स्पष्ट तौर पर अलकायदा से अमेरिका और उसके सहयोगियों को ना डराने की बात कही है। लेकिन जानकारों का सवाल है कि क्या जमीनी स्तर पर तालिबान का ये वादा पूरा होता नजर आएगा।

अफगान के जानकारों का मानना है कि तालिबान संगठन में अब एकाश्म नहीं रहा है। दशकों से तालिबान में शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो चुका है, जिसके तहत हर कमांडर के पास अपना फैसला लेने की आजादी है। शक्तियों के विकेंद्रीकरण से शांति समझौते के जमीनी स्तर पर परिणाम दे जाना संदेहपूर्ण लगता है।

जितने भी आदिवासी समूह हैं उसमें हक्कानी नेटवर्क सबसे ज्यादा शक्तिशाली और खतरनाक संगठन है। हक्कानी नेटवर्क मुख्त रूप से पाकिस्तान के वजिरिस्तान में स्थित है। हक्कानी परिवार ने जलालउद्दीन हक्कानी की मौत के बाद अलकायदा और पाकिस्तान के आईएसआई संगठन से नाता तोड़ लिया था।

इसके बाद हक्कानी संगठन ने उन्नति करना शुरू कर दिया था और इसके मौजूदा नेता सिराजुद्दीन हक्कानी अफगान तालिबान का सेकंड-इन-कमांड के तौर पर काम करता है। जबकि सिराजुद्दीन हक्कानी का छोटा भाई समझौते वाली टीम में शामिल था। 



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