Health News

World Thalassemia day 2020: बचपन में रहे हों थैलेसीमिया के लक्षण, तो शादी से पूर्व दुल्हा-दुल्हन करा लें HPLC टेस्ट


मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर की ओर से 2018 में जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष करीब 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसिमिया की गंभीर बीमारी (थैलेसीमिया मेजर) के साथ पैदा होते हैं, जो विश्व में सर्वाधिक है। भारत में कई ऐसे राज्य हैं, जहां अन्य राज्यों की अपेक्षा थैलेसीमिया के मामले काफी ज्यादा हैं। पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और असम में भी इसके काफी मामले देखे जाते हैं। 

हर साल करीब एक लाख बच्चे थैलेसीमिया मेजर के दुनिया में जन्म लेते हैं। इनमें से 10 प्रतिशत यानी 10 हजार भारत में जन्म लेते हैं। दक्षिण भारत में जहां थैलेसीमिया के 1 से 3 प्रतिशत मरीज हैं, जबकि उत्तर भारत में यह आंकड़ा 15 प्रतिशत तक है। यदि एक बार किसी बच्चे में थैलेसीमिया के लक्षण पाये गये, तो जिंदगी भर उसे इसका इलाज कराते रहना पड़ता है। थैलेसीमिया के प्रति जगारुकता फैलाने के लिए आठ अप्रैल को विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है।

थैलेसीमिया है क्या?

थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग है, जो मनुष्य के रक्त को प्रभावित करता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें रोग परिवार में एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में उसके बॉडी वेट का सात प्रतिशत खून होता है। यह करीब 4.7 से 5.5 लीटर होता है। यह खून बोन मैरो में बनता है। बोन मैरो इनसान की प्रमुख हड्डियों के बीच पाये जानेवाला मुलायम ऊतक है। जिसे अस्थि मज्जा भी कहते हैं। जिस रोगी को थैलेसीमिया हो जाता है, उसके शरीर में हीमोग्लोबीन में गड़बड़ी आ जाती है। इससे लाल रक्त कण (RBC) नहीं बन पाते हैं और शरीर में खून की कमी होने लगती है और यदि मरीज को थैलेसीमिया मेजर हो, तो 25-30 साल में उसके शरीर में इतनी समस्याएं आने लगती हैं कि अंतत: उसकी मृत्यु हो जाती है।

थैलेसीमिया के प्रकार : तीन तरह के थैलेसीमिया होते हैं, माइनर, इंटरमीडिएट और मेजर।

थैलेसीमिया माइनर : चूंकि यह आनुवंशिक रोग है, इसलिए यह बच्चों को तभी होता है, जब माता-पिता में इसके लक्षण हों। थैलेसीमिया माइनर इस बीमारी का शुरुआती स्टेज है। माता-पिता में से किसी एक को यदि थैलेसीमिया माइनर हो, तो बच्चे को थैलेसीमिया माइनर हो सकता है। थैलेसीमिया माइनर का पता आसानी से नहीं चलता है। इसका पता लगाने के लिए मरीज का HPLC ( High-performance liquid chromatography) टेस्ट करना जरूरी होता है। हालांकि, थैलेसीमिया माइनर में मरीज को खून की कमी तो होती है, पर उसे अलग से खून की जरूरत नहीं होती। बेहतर खान-पान की और हेल्दी डायट से मरीज की स्थिति कंट्रोल की जा सकती है। इसका एकमात्र लक्षण यही है कि व्यक्ति को एक बार से अधिक जॉन्डिस हो सकता है।
थैलेसीमिया इंटरमीडिएट : नाम के अनुसार ही यह मेजर और माइनर के बीच का स्टेज है। इसके लक्षण बच्चों में 4-5 वर्ष की उम्र में पता चलने लगते हैं। इसमें हर 3-4 माह में बच्चे को खून चढ़ाने (blood transfusion) की जरूरत पड़ती है।

थैलेसीमिया मेजर : यह बीमारी काफी गंभीर है। यदि मरीज के माता-पिता दोनों को थैलेसीमिया माइनर हो, तो बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा रहता है। इसलिए जिन प्रदेशों में थैलेसीमिया के ज्यादा मरीज पाये गये हैं, वहां शादी से पूर्व ही थैलेसीमिया की जांच के लिए वर और वधु दोनों का HPLC टेस्ट करा लिया जाता है। जिस दंपत्ति ने यह टेस्ट शादी से पूर्व न कराया हो और उन्हें अंदाजा हो कि उनको थैलेसीमिया माइनर है, तो गर्भ धारण करने के 10वें से 12वें सप्ताह के बीच उन्हें म्यूटेशन टेस्ट करा लेना चाहिए और यदि थैलेसीमिया के लक्षण पाये जाएं, तो गर्भपात करा लेना ही बेहतर उपाय है। यह गर्भपात कानूनन सही भी माना जाता है।
थैलेसीमिया मेजर के लक्षण 5 से 6 माह के बच्चे में दिखने लगते हैं और उसे माह में एक बार खून देने की जरूरत होती है।
बचाव :  जिन लोगों को थैलेसीमिया हो, उन्हें आयरन की मात्रा वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम या बिल्कुल नहीं करना चाहिए। लोग ये मानने लगते हैं कि थैलेसीमिया है, तो हड्डी कमजोर हो जायेगी, इसलिए वे बिना डॉक्टर की राय के ही फॉलिक एसिड टैबलेट का सेवन करने लगते हैं, जबकि यह घातक हो सकता है।

बोन मैरो ट्रांसप्लाट : रोगी के लिए एक उपाय बोन मैरो ट्रांसप्लांट का भी है। हालांकि, इसके लिए बोन मैरो मिलना आसान नहीं होता। इसके लिए ब्लड ग्रुप के मिलने के साथ, उसके खून में सभी अवयव होने भी जरूरी है और उस व्यक्ति का निरोग होना भी जरूरी है। इसलिए ऐसे केस में ज्यादातर भाई-बहन के बोन मैरो का ही ट्रांसप्लांट हो पाता है।

थैलेसीमिया में आयरन की गोली है हानिकारक
हीमोग्लोबीन हिम और ग्लोबीन शब्द से बना है। हिम का मतलब होता है आयरन, जबकि ग्लोबीन खून में मौजूद प्रोटीन होता है। प्रोटीन को भी दो भागों में बांटा जाता है – अल्फा और बीटा। अल्फा प्रोटीन की कमी के कारण होनेवाले रोग को अल्फा थौलेसीमिया कहते हैं। अल्फा प्रोटीन हीमोग्लोबीन बनाने में सहायक होता है। इसकी कमी के कारण शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ने लगती है, जबकि प्रोटीन की मात्रा में कमी आने लगती है, जिससे लाल रक्त कणों की कमी होती है। वहीं, आयरन की अधिकता होने के कारण हृदय और किडनी पर असर पड़ने लगता है। अंत में रोगी को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है और 25-30 साल की उम्र तक उसकी मौत हो जाती है।

डॉ अविनाश सिंह, कंसल्टेंट हेमोटोलॉजिस्ट, एम्स, नई दिल्ली और डॉ दिव्या सुमन, सीनियर रेजीडेंट, गायनोकोलॉजी विभाग, मधेपुरा मेडिकल कॉलेज, बिहार से बातचीत पर आधारित।



Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close
Close